महिला दिवस औऱ रोजमर्रा की औरतों की जिंदगी ।

 

महिला दिवस  औऱ  रोजमर्रा की औरतों की जिंदगी ।

आज 8 मार्च अंतराष्ट्रीय महिला दिवस हैं । सर्वप्रथम आप सभी को महिला दिवस की  हार्दिक शुभकामनाएं ।
महिलाओं की हम सभी के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं। महिलाओं के महत्व को शब्दों में वर्णित कर पाना बहुत कठिन कार्य है ।  महिलाएं ही हैं जो समाज को चलाती हैं। एक महिला एक समाज का एक अभिन्न अंग हैं जिसके बिना प्रकृति की सुंदरता की सोभा हैं ।  सभी जानते है आज 8 मार्च  महिला दिवस है , देश के गाँव के हर कोने -कोने में  इस अवसर पे महिलाओं को सम्मानित किया जाता हैं । हर एक नागरिक आज के दिन सभी महिला को सम्मान देते हैं । उनके लिए तरह- तरह के उपहार लाते हैं । विद्यालय , कॉलेज में कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं । पहला महिला दिवस वर्ष 1900 में शुरू हुआ और उस समय इसे स्‍त्री और पुरुषों में मौजूद भेदभाव को खत्‍म करने के लिए मनाया गया था।  ये सब बस महिला दिवस के दिन होती हैं । लेकिन बाकी के दिनों में ऐसा भी होता क्या ? नही एक तरफ महिला दिवस के दिन महिलाओं को सम्मानित करते हैं , उपहार देते हैं । उन्हें प्रेरणा देते हैं  लेकिन साल के 364 दिन उन्हें रूलाते है , अपमानित करते हैं । क्या 364 हम भूखे रहे और एक दिन खाना मिले तो क्या हम जी पाएंगे ।वो भोजन ग्रहण कर पाएंगे नहीं । जब हम ऐसा नही कर सकते तो फिर नारी को सम्मान के लिए एक ही दिन काफी है । महिलाएं घर और बाहर की दोहरी जिम्‍मेदारियों को एक साथ निभाते हुए हर क्षेत्र में आगे बढ़ वही है । महिला दिवस के दिन उन्हें प्यार दिया जाता है , सम्मान दिया है । लेकिन प्रत्येक दिन वही महिला दरिंदों के शिकार होती है । कभी आत्महत्या कर लेती है , तो। कभी जिंदा जलायी जाती है । क्या फायदा इस महिला दिवस का जब महिलाएं सुरक्षित ही नही है । जब महिला खुद की आत्मसम्मान के लिए देह त्याग करती है तब समाज कहा रहता  । तब उसे क्यों नहीं प्रेरणा देते हैं । फिलहाल में ही एक देश की बेटी आयशा खुद के आत्मसम्मान के लिए साबरमती में कूद के जान गवा दी । वो भी अपने परिवार से एक दहेज के कारण बार - बार  अपमानित होकर । सही मायने में अगर महिला दिवस मनाना हैं , तो हमे एक दिन नहीं प्रत्येक दिन महिलाओं को रक्षा करना होगा । उन्हें प्रत्येक दिन आगे बढ़ने के लिए साथ देना चाहिए । महिला दिवस मना रहे और देश की महिला सुरक्षित नहीं , खुद को जीते जी मर रही । हर दिन महिला दिवस मनाया जाए ताकि प्रत्येक दिन महिलाओं को सम्मान मिले , साथ मिले । वक्‍त बदल चुका है और वक्‍त के साथ लोगों की सोच में भी बदलाव लाने की जरूरत है ।  देश की हर एक बेटी हर नारी को किरण बेदी बनना है । ताकि दुबारा कोई आयशा या हाथरस की मनीषा का जन्म न हो उन्हें जिंदा जलना परे । हालांकि, महिलाओं की आजादी और सशक्तिकरण के लिए  आज भी लोगों की सोच में संशोधन की  बहुत ज्यादा जरूरत हैं,
मगर महिलाओं के पैरों में  बेड़ियां डालने वाली सोच आज भी खत्‍म नहीं हुई है। मगर हमारे समाज में कुछ ऐसी महिलाएं भी है, जिन्‍हें नकारात्‍मकता में सकारात्‍मकता की किरणों को तलाशना आता है। तभी वो आज उस मुकाम पे हैं जहाँ महिलाओं का होना एक गर्व की बात हैं । कभी महिलाओं को सुंदरता के नाम पे बदमाशों ने उसका  शोषण किया तो कभी पीरियड के नाम पे समाज ने उसे कमजोर समझा । आखिर क्यों महिलाओं को ही इतनी कष्ट है ।  आज भी हमारे देश में पीरियड्स एक ऐसा विषय बना है जो कि हर दिन उसे नीचा दिखाया जाता हैं । मेरी दुनिया, मेरे नियम, मेरी परिभाषा , मेरी सुरक्षा मेरा आत्मसम्मान तब । महिलाएं  इस तरह से सोचने लगे तो उम्र, करियर, काम, परिवार आदि कोई भी बंदिश उन्हें वो करने से नहीं रोक सकती है जो वो चाहती हैं। हर मुकाम हासिल कर सकती है । अगर इसमे महिलायें आगे बढ नहीं पा रही टी उसमे पुरूषप्रधान मानसिकता तो है ही साथ मे हम नारी भी जिम्मेदार हैं । क्योंकि महिला वो शक्ति जो हजारो पुरुषों को भी हराने के लक्ष्य रखती हैं । बस जरूरत  है  हमें खुद के अंदर का आत्मविश्वास मजबूत करना है डट कर सामना करना ।महिला को एक अद्भुत ताकत मिली है कि वह एक नई जिंदगी को जन्‍म दे सकती हैं।' इसीलिए महिलाओं को जगत जननी पालनहार भी कहा जाता हैं ।
महिलाओं को हमेशा ही कभी उनके चरित्र को लेकर तो कभी उनकी काबलियत को लेकर जज किया जाता रहा है। मगर इससे सहम कर और डर कर पीछे हटने की जरूरत नहीं है। बल्कि  हिम्मत से सामना करने की जरूरत है । लोग कहते हैं नारी कमजोर है लेकिन वो ये नही जानते कि घर चलाने नारी के हाथों में ही डोर हैं ।

लाखों मोती चाहिए एक माला बनाने के लिए,
लाखों  दीपक चाहिए एक आरती सजाने के लिए,
लाखो जल की बूंद चाहिए समुद्र बनाने के लिए,
पर एक स्त्री अकेली है काफी है घर को स्वर्ग बनाने के लिए।


महिलाओं को सशक्त बनाना एक बड़ी जिम्मेदारी है।हर महिला विशेष होती है, चाहे वह घर पर हो या ऑफिस में।
हमारे समाज की दर्पण हैं महिलाएं आज तो कई ऐसे प्रतिष्ठान एवं संस्थाएं हैं, जिन्हें केवल नारी संचालित करती है। हालांकि यहां तक का सफर तय करने के लिए महिलाओं को काफी मुश्किलों एवं संघर्षों का सामना करना पड़ा है   । और महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए अभी आगे मीलों लम्बा सफर तय करना है, जो दुर्गम एवं मुश्किल तो  है लेकिन महिलाओं ने ही ये साबित किया है कि वो हर कार्य को करने में सक्षम हैं। इसीलिए प्रत्येक महिला दिवस मनाया जाए । तब सही मायने में महिला दिवस की उद्वेश्य पूरी होगी । हम गहराई से झांककर देखें तो महिला हो या पुरुष दोनों में सबकुछ करने की अपार क्षमता छिपी हुई है और दोनों ही आसमान छू सकते है तो आखिर क्यों क्षमता रहित समझकर नारी को सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता से वंचित किया जाता है । महिलाएं समाज के विकास एवं तरक्की में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनके बिना विकसित तथा समृद्ध समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती।प्रगति करने के साथ ही महिलाओं के साथ होने वाली दुर्घटनाओं के मामला भी काफी बढ़ा है । आमतौर पर महिलाओं को  दहेज-हत्या, यौन उत्पीड़न, महिलाओं से लूटपाट, नाबालिग लड़कियों से राह चलते छेड़-छाड़ इन सब से रोज गुजरना पड़ता है ।  अतः महिला दिवस और रोजमर्रा की औरतों की जिंदगी में काफी अंतर है । हमारा उद्देश्य इस अंतर को जड़ से मिटाना और प्रत्येक दिन महिला दिवस मनाना ।

मनीषा कुमारी
मुम्बई





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