सोचती हूं हर-पल क्या यही मेरी कहानी है .....

 सोचती हूं हर-पल  क्या यही   मेरी कहानी है .....

बनते बिगड़ते हालातो से , 
खुद को संभालना सीखती हूँ ।
हर रोज एक नया पन्ना , 
जिंदगी की किताब में जोड़ती हुँ ।

सोचती हूँ हर -पल क्या यही मेरी कहानी हैं ।।

हर शुबह एक नया सवेरा आती हैं ।
हर शाम को सूरज ढल जाती हैं ।।
गमो के इस शहर में खुशियों की तलाश करती हूँ । 
जैसे तड़पते मछ्ली पानी की खोज में रहती हैं ।।

सोचती हूं हर -पल क्या यही मेरी कहानी हैं ।।

कभी थक जाती हूं ,
किसी राह पे , रुक जाती हूं , 
लेकिन हौसला कभी नही हारती हूं। 
हर मुश्किलो का सामना एक प्यारी सी मुस्कान से करती हूँ।

सोचती हर -पल क्या यही मेरी कहानी  हैं ।

मनीषा कुमारी 
विरार ( महाराष्ट्रा )

Comments

Post a Comment