सोचती हूं हर-पल क्या यही मेरी कहानी है .....
सोचती हूं हर-पल क्या यही मेरी कहानी है .....
बनते बिगड़ते हालातो से ,
खुद को संभालना सीखती हूँ ।
हर रोज एक नया पन्ना ,
जिंदगी की किताब में जोड़ती हुँ ।
सोचती हूँ हर -पल क्या यही मेरी कहानी हैं ।।
हर शुबह एक नया सवेरा आती हैं ।
हर शाम को सूरज ढल जाती हैं ।।
गमो के इस शहर में खुशियों की तलाश करती हूँ ।
जैसे तड़पते मछ्ली पानी की खोज में रहती हैं ।।
सोचती हूं हर -पल क्या यही मेरी कहानी हैं ।।
कभी थक जाती हूं ,
किसी राह पे , रुक जाती हूं ,
लेकिन हौसला कभी नही हारती हूं।
हर मुश्किलो का सामना एक प्यारी सी मुस्कान से करती हूँ।
सोचती हर -पल क्या यही मेरी कहानी हैं ।
मनीषा कुमारी
विरार ( महाराष्ट्रा )
Super ❤️👍
ReplyDeleteVery nice ❤️
ReplyDeleteSuperb
ReplyDeletewow mannuuu keep it up👍🏻❤
ReplyDeleteThanks dear everyone
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